गुरुवार, 22 फ़रवरी 2018

लंका की कहानी

एक समय दो गन्धर्वों में विवाद हो गया कि वासुकि (स्वर्ग लोकों का एक शक्तिशाली सर्प) और वायुदेव में से कौन अधिक बलवान है? पहले गन्धर्व ने वासुकि के गुणों का बखान करते हुए कहा कि वासुकि इतने महान हैं कि समुद्र मंथन के दौरान भगवान् विष्णु ने मथनी की रस्सी के लिये स्वयं वासुकि का चुनाव किया था। इतना ही नहीं, जब सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान विष्णु मत्स्य अवतार में प्रकट हुए तो उस समय भी उन्होंने वासुकि की ही सहायता ली। दूसरे गन्धर्व के पास वायुदेव की महिमा में कहने के लिए कुछ अधिक नहीं था।

जब यह समाचार वायुदेव के पास पहुँचा तो अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए उनका अंहकार मचलने लगा। वास्तव में हमारा मन तिल का ताड़ तथा राई का पहाड़ बनाने में दक्ष होता है।

वासुकि ने भी अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए उत्साहपूर्वक उस चुनौती को स्वीकार कर लिया, और उन दोनों गन्धर्व चमचे उनके अहंकार के गुब्बारे में हवा भरने लगे। पराजय अथवा नीचा दिखने का भय असुरक्षा को जन्म देता है। इस असुरक्षा से अपनी रक्षा करने के लिए अकसर ऐसे लोग स्वयं को चमचों से घेर लेते हैं।

दोनों के संघर्ष में मेरु पर्वत बलि का बकरा बन गये। वासुकि ने उसके चारों ओर तीन कुण्डली मार लीं और वायु को अपनी शक्ति सिद्ध करने के लिए वासुकि की पकड़ को ढीला करना था। अपने गर्व की रक्षा करने में अंधे हो चुके वे दोनों भूल गये कि ऐसा करने से पहले उन्हें मेरु पर्वत की अनुमति लेनी चाहिए। अपने संघर्ष में पर्वत पर होने वाले अत्याचार का दोनों ने ही विचार नहीं किया।

अहंकार पर आधारित मतभेद का पहला परिणाम होता है कि हम अपने
आसपास के लोगों तथा परिवेश के प्रति असंवेदनशील बन जाते हैं।

मेरु पर्वत की परवाह न करते हुए उन दोनों के बीच टक्कर आरम्भ हो गयी। वायु जितना ज़ोर लगाते, वासुकि पर्वत पर अपनी पकड़ को उतनी मजबूत करा देते। दोनों को पर्वत की कोई चिन्ता नहीं थी। दोनों के बीच युद्ध में मेरु को सबसे अधिक पीड़ा सहन करनी पड़ी। वे दोनों शक्तिशाली थे, परन्तु भूल गये कि शक्ति के साथ-साथ उतरदायित्व भी आता है।

न तो वासुकि और न ही वायु टस से स होने के लिये तैयार थे। परेशान मेरु ब्रह्माजी के पास पहुँचे और अपनी कहानी सुना दी। इन दो महाशक्तियों के टकराव को रोकने के लिए किसी तीसरी शक्ति के हस्ताक्षेप की आवश्यकता थी। विशेष रूप से जब हमारा अहंकार टकराता है तो उस समय हमें सही न्याय के लिए तीसरे व्यक्ति के दृष्टिकोण की आवश्यकता पड़ती है।

ब्रह्माजी ने दोनों गन्धर्वों को समझाया कि सृष्टि में न तो कोई छोटा है और न कोई बड़ा। प्रत्येक वस्तु एवं व्यक्ति का निर्माण एक विशेष उद्देश्य के लिए किया गया है। उन्होंने उन्हें समझाया कि भगवान द्वारा दी गयी शक्तियों का उद्देश्य परस्पर सहयोग करना है, स्पर्धा नहीं; एक-दूसरे के पूरक बनना है, विरोधी नहीं।

स्वयं निरंकुश शासक बनने के स्थान पर यदि हम मिलजुलकर कार्य करें तो वह न केवल प्रत्येक व्यक्ति के हित में होगा, अपितु हमारी व्यक्तिगत क्षमताओं में निखार लायेगा।

अपनी गलती का एहसास करते हुए वायु देव व वासुकि नाग ने आपसी स्पर्धा रोक दी। जैसे ही वासुकि नाग ने मेरु पर्वत के ऊपर से अपनी पकड़ ढीली की, एक विशाल चट्टान का टुकड़ा टूट कर समुद्र में गिर पड़ा। उस विशालकाय चट्टान की तीन चोटियाँ थीं, इसलिए उसका नाम त्रिकूट पड़ा। विश्वकर्मा ने देवताओं के विहार हेतु रमणीय स्थान बनाने के लिए इसी चट्टान को चुना, और लंका भी इसी पर बसायी गयी।

दो महान शक्तियों के बीच ईर्ष्या और द्वेष के परिणाम से यह चट्टान गिरी थी। कहीं यही कारण तो नहीं था कि लंका का नाम इतिहास में ईर्ष्या और द्वेष के साथ जुड़ गया।?

जिस सूक्ष्म चेतना के साथ हम किसी वस्तु का निर्माण करते हैं, वही चेतना उस वस्तु में समा जाती है।

-- श्री शुभविलास दास, (इस्कान मुम्बई में रहते हैं और कार्पोरेट जगत् में संगोष्ठियों का आयोजन करते हैं) 

(भगवद् दर्शन, जून 2014 अंक से)

शुक्रवार, 16 फ़रवरी 2018

जब आपने एक ही समय में दो शहरों में भक्तों को सम्बोधित किया

श्रील भक्ति सिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर प्रभुपाद के शिष्य श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज 'विष्णुपाद' जी एक बार भारत के प्रदेश आसाम में प्रचार में थे । आसाम में श्री चैतन्य गौड़ीय मठ के सरल प्रकृति के शिष्य ने श्रीमाधव माहाराज जी को निवेदन किया । उसने कहा कि मेरे पिताजी ने तो अपने जीवन में भजन नहीं किया।  मैं चाहता हूँ कि आपके द्वारा उनका श्राद्ध हो जाये ताकि उनका कल्याण हो जाये। आप मेरे पिताजी के श्राद्ध पर आयें ताकि उनका कल्याण हो । श्रीमाधव महाराज जी ने डायरी देख कर बताया कि उस समय तो वे कोलकाता में प्रचार कार्यक्रम में होंगे क्योंकि उन दिनों वहाँ सम्मेलन चल रहा होगा। उन्होंने उस शिष्य को कहा कि उस समय तो मेरा आना मुश्किल है किन्त मैं योग्य व्यक्तियों को  भेज दूँगा। बड़ी विनम्रता से उस भक्त ने कहा कि आपके आने से बहुत अच्छा होता। 


कोलकाता में प्रचार कार्यक्रम के दौरान श्रीमाधव महाराज जी ने अपने गुरु भाई (श्रील प्रभुपाद के शिष्य) श्री कृष्ण केशव दास ब्रह्मचारी, श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज जी तथा श्री मंगल निलय ब्रह्मचारी को आसाम भेजा। ट्रेन लेट होने के कारण आप समय पर वहाँ नहीं पहुँच पाये। जब आप उनके घर से कुछ दूरी पर थे, तो आपने देखा कि सभी लोग प्रसाद पाकर हाथ धो रहे हैं। ऐसे समय पर वहाँ जाना, श्री मंगल निलय ब्रह्मचारी ने अपना अपमान समझा। और साथियों से निवेदन किया कि हमें वहाँ नहीं जाना चाहिये, क्योंकि उन्होंने हमारी प्रतीक्षा नहीं की । वैसे प्रोग्राम खत्म भी हो गया है।                                                                                                                    


श्रील तीर्थ महाराज जी ने कहा कि आपकी बात ठीक है परन्तु हमार कोई दोष नहीं , हमारी ट्रेन लेट हो गयी। दूसरी बात जब कोलकाता जायेंगे तो  गुरुजी पूछेंगे कि प्रोग्राम कैसा रहा, तब हम क्या जवाब देंगे कि हम वहाँ गये ही नहीं ? श्रीकृष्ण केशव प्रभुजी ने भी श्रीतीर्थ महाराज जी की बात को सही ठहराया। और फिर तीनों उनके घर पहुँच गये।  


उनको देख कर सभी भक्तों में खुशी की लहर दौड़ गयी और सभी के मुख पर एक ही प्रश्न था कि आप श्रीमाधव महारज के साथ क्यों नहीं आये ? आप उनके साथ आते तो और भी अच्छा होता। श्रील केशव प्रभु जी ने कहा हमारे मठ का कोलकाता में सम्मेलन चल रहा है,  इसलिये श्रीमाधव महाराजजी नहीं आये और उन्होंने हमको भेजा है। सभी भक्तों के चेहरे देख कर ऐसा लग रहा था कि जैसे वे इनकी बात सुन कर हैरान हों।         

तब सबकी ओर से जिन भक्त के पिताजी का श्राद्ध था, वे बोले कि आप क्या बात करते हैं , श्रील गुरुदेव, माधव महाराज जी तो यहाँ आये थे। उन्होंने पहले प्रवचन किया, उपदेश दिये । उन्होंने स्वयं सारा अनुष्ठान किया, अभी थोड़ी देरे पहले ही यहाँ से वे निकले।                                                                                                                      



उनकी बातें सुन कर ये तीनों के तीनों हैरान हो गये। और सोचने लगे यह कैसे सम्भव है ? भक्तों ने आप तीनों को सारी जगह दिखाई जहाँ श्रीमाधव महाराज जी ने प्रवचन किया, पूजा की, श्राद्ध करवाया, प्रसाद पाया । उसके बाद आप लोगो ने स्नान इत्यादि करके प्रसाद पाया, रात को संकीर्तन किया भक्तों के साथ, और अगले दिन वापिस चल पड़े ।             


कोलकाता पहुँच कर आपने भक्तों को सबसे पहले यही पूछा कि आज कल प्रवचन कौन कर रहा है ? सभी ने जवाब दिया कि गुरु महाराज जी तथा अन्य सन्नयासी जन। आप लोगों ने पूछा कि क्या बीच में एक दो दिन गुरुजी कहीं गये थे, अथवा यहाँ नहीं थे? उत्तर मिला कि नहीं वो तो रोज यहाँ पर प्रवचन कर रहे हैं । बल्कि परसों तो उन्होंने स्वयं संकीर्त्तन भी किया। सब मठ के महात्माओं की बात सुनकर आपको हैरानी हुई।                                                                                                         
सामान रख कर आप सीधे श्रीमाधव महाराज के कमरे में गये। प्रणाम इत्यादि होने के बाद श्रीमाधव महाराज जी ने आपके हाल-चाल पूछे, यात्रा /कार्यक्रम के बारे में पुछा , इत्यादि । जवाब में श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज जी ने कहा, ' हमारी ट्रेन थोड़ा लेट हो गयी थी परन्तु वहाँ भक्तों से सुना कि वहाँ की सारा पूजा, श्राद्ध, प्रवचन, इत्यादि सब आपने किया। श्रीतीर्थ महाराज जी की बात सुन कर श्रीमाधव महाराज जी मुस्कुराये। पुन: श्रीतीर्थ महाराज जी ने उनसे जानना चाहा कि यह कैसे सम्भव हुआ कि एक ही समय पर आप कोलकाता में यहाँ पर संकीर्त्तन / प्रवचन कर रहे थे भक्तों के साथ, और उधर दूर आसाम में भी उसी समय आप प्रवचन, पूजा और श्राद्ध कर रहे थे। इसके जवाब को श्रीमाधव महाराज जी टाल गये। और कहा कि बहुत दूर से आये हो, हाथ इत्यादि धोकर प्रसाद पाओ। 



रविवार, 11 फ़रवरी 2018

----जी नहीं महोदय! ठंड नाम का कुछ नहीं होता (कक्षा में सन्नाटा छा गया)---

दर्शन शास्त्र का एक नास्तिक अध्यापक अपनी कक्षा के बच्चों को समझा रहा था कि विज्ञान को भगवान से क्या समस्या है?

उसने एक छात्र को खड़ा किया व कहा -- तो तुम भगवान में विश्वास करते हो?
छात्र - जी हाँ।

अध्यापक - क्या भगवान सर्वशक्तिमान है?
छात्र - जी हाँ।

अध्यापक - मेरा भाई रोग के कारण मारा गया। हालांकि वो रोज़ भगवान से प्रार्थना करता था कि वह उसे बचा ले। हम सब लोग असहाय की सहायता करते हैं, किन्तु तुम्हारे भगवान ने नहीं की। तो भगवान अच्छा कैसे हुआ?
छात्र ने कोई जवाब नहीं दिया।

अध्यापक - तुम बोल क्यों नहीं रहे? क्योंकि तुम्हारे पास जवाब है ही नहीं। अच्छा, दोबारा शुरु करते हैं।

अध्यापक - क्या भगवान अच्छा है?
छात्र - जी हाँ।

अध्यापक - क्या शैतान अच्छा होता है?
छात्र - जी नहीं/

अध्यापक - बुरे लोग अथवा शैतान आत्मायें कहाँ से आती हैं?
छात्र - भगवान से।

अध्यापक - बिल्कुल ठीक। अब ये बताओ कि जगत में बुराई है?
छात्र - जी।

अध्यापक - हर जगह दुराई है। है कि नहीं? और भगवान ने ही सब कुछ बनाया है?
छात्र - जी।

अध्यापक - तो किसने बुराई को बनाया?
छात्र  ने कोई जवाब नहीं दिया।

अध्यापक - क्या बिमारी होती है? घृणा, चालाकी, बदसूरती - ये सब इस जगत में हैं कि नहीं?
छात्र - जी, सर!

अध्यापक - और इन सबको किसने बनाया?
छात्र ने इसका भी कोई जवाब नहीं दिया।
अध्यापक - विज्ञान के अनुसार तुम्हारे पास पाँच इन्द्रियाँ हैं, जिनसे तुम इस जगत को महसूस कर सकते हो, देख सकते हो, इत्यादि। अब मेरे बच्चे तुम बताओ कि क्या तुमने भगवान को देखा है?
छात्र - जी नहीं।

अध्यापक - क्या तुमने कभी भगवान को सुना है?
छात्र - जी नहीं।

अध्यापक - क्या तुमने कभी भगवान को महसूस किया हैं? सूंघा है, चखा है, क्या किसी भी प्रकार से भगवान को इन इन्द्रियों के माध्यम से जाना है?
छात्र - जी नहीं, सर!

अध्यापक - फिर भी तुम उसमें विश्वास रखते हो?
छात्र - जी।

अध्यापक - एम्पिरिकल (अनुभव) के आधार पर, परीक्षण के आधार पर, प्रदर्शनीय प्रमाण के आधार पर, विज्ञान कहता है कि तुम्हारा भगवान है ही नहीं……………………तुम्हारा इस बारे में क्या विचार है, मेरे बच्चे?
छात्र - कुछ विशेष नहीं। परन्तु मुझे विश्वास है कि भगवान हैं।


अध्यापक - हाँ! विश्वास! यही तो विज्ञान की समस्या है......................।

छात्र -अध्यापक महोदय! क्या गर्मी नाम का कुछ होता है?
अध्यापक - हाँ।

छात्र - और क्या ठंंड नाम का कुछ होता है?
अध्यापक - हाँ।

छात्र - जी नहीं महोदय! ठंड नाम का कुछ नहीं होता (कक्षा में सन्नाटा छा गया)

छात्र - सर! आप बहुत सी गर्मी नाप सकते हैं। गर्मी, ज्यादा गर्मी, बहुत ज्यादा गर्मी, इत्यादि, इन सबको आप नाप सकते हैं। हम लोग शून्य तापमान से 458 डिग्री नीचे जा सकते हैं, जहाँ बिल्कुल गर्मी नहीं होती। हम लोग इससे और नीचे नहीं नाप सकते…………………वास्तव में ठंड
होती ही नहीं, क्योंकि ठंड नाम एक शब्द है जिसका इस्तेमाल गर्मी न होने के लिये किया जाता है। हम ठंड को नाप नहीं सकते जबकि हम गर्मी को तो नाप सकते हैं। गर्मी एक ऊर्जा है। ठंड, उसका विपरीत नहीं है, बल्कि उसका 'न' होना है। (कक्षा हाल में सन्नाटा गहरा गया)। गर्मी की कमी ही ठंड है। गर्मी जितनी कम होगी उसे ही उतनी ज्यादा ठंड का नाम दिया जाता है।

छात्र - श्रीमान! क्या अंधेरा होता है?
अध्यापक - हाँ। अगर अँधेरा नहीं होता तो फिर रात क्या है?

छात्र - आप फिर गलत बोल रहे हैं, सर! प्रकाश के न होने को अंधेरा कह देते हैं। आप हल्का प्रकाश, साधारण प्रकाश, इत्यादि कह सकते हैं। किन्तु कुछ समय लगातार प्रकाश न हो तो आप उसे अंधेरा कह देते हैं। वास्तविकता तो यह है कि अंधेरा होता ही नहीं, अगर अंधेरा होता तो आप उसको नाप सकते थे। प्रकाश के न होने को अंधेरा कह देते हैं। क्यों, मैं ठीक कह रहा हूँ, न , सर!।

अध्यापक - मेरे बच्चे, तुम कहना क्या चाह रहे हो?
छात्र - श्रीमान्! मैं यह कहना चाहता हूँ कि आपके दर्शन में कमी है।

अध्यापक - क्या कमी है? कैसे?
छात्र - सर! आप द्वन्द्व के आधार पर बात कर रहे हैं। आप कहते हैं कि
जीवन है, फिर मृत्यु भी है। अच्छा भगवान है और बुरा भगवान भी है। आप भगवान को एक मापदण्ड में मापना चाहते हैं, जैसे वे एक सीमा में बँधे हैं, जिसे हम नाप सकते हैं। सर! विज्ञान तो 'मन के भाव अथवा विचार' की व्याख्या भी नहीं कर सकता। फिर भगवान तो आगे की चर्चा का विषय है।

विज्ञान बिजली की ऊर्जा और चुम्बकीय ऊर्जा को इस्तेमाल तो करता है, परन्तु उसको समझ्ना तो दूर, विज्ञान ने उनको देखा तक नहीं है। एक अनजान व्यक्ति मृत्यु को जीवन के विपरीत कहेगा क्योंकि मृत्यु अपने - आप में होती ही नहीं है। बिना जीवन के उसके अस्तित्व को कोई मुल्य नहीं है। जीवन के सन्दर्भ में ही मृत्यु की पहचान है। मृत्यु हमारे जीवन का विपरीत नहीं बल्कि उसका न होना है। अब आप मुझे बताईये सर! कि क्या आप अपने छात्रों को ये नहीं बताते कि बन्दर हम सब के पूर्वज हैं?

अध्यापक - अगर तुम प्राकृतिक विकास क्रिया (Natural Evolutionary process) की बात कर रहे हो तो, हाँ, मैं यही कहता हूँ।
छात्र - क्या आपने इस क्रिया को अपनी आँखों से होते देखा है? (अध्यापक मुस्करा दिये व समझ गये कि बात किस ओर जा रही है)

छात्र - चूँकि न तो किसी ने इस विकास की क्रिया को देखा है और न ही कोई इसे प्रमाणित कर सकता है कि वे विकास क्रिया अभी भी चल रही है, तो क्या यह कहना गलत नहीं होगा कि सर! आप कक्षा में अपने विचार रख रहे हैं? क्या यह कहना भी गलत नहीं होगा कि वास्तव में आप वैज्ञानिक नहीं बल्कि खोखले प्रचारक हैं? (कक्षा में शोर होने लगा)

अन्य छात्रों को सम्बोधित करते हुए - क्या किसी ने अध्यापक महोदय का दिमाग देखा है? (कक्षा में हँसी का ठहाका गूँजा)

बड़े ही सम्मान से छात्र ने पुनः कहा - क्या ऐसा कोई है यहाँ पर, जिसने
कभी अध्यापक महोदय के दिमाग को देखा हो, सुना हो, महसूस किया हो, स्पर्श किया हो अथवा सूंघा हो।……………………ऐसा लगता है कि किसी ने ऐसा नहीं किया। तो वैज्ञानिक सिद्धान्त के आधार पर अर्थात् एम्पिरिकल (अनुभव) के आधार पर, परीक्षण के आधार पर, प्रदर्शनीय प्रमाण के आधार पर विज्ञान कहता है कि आपका दिमाग ही नहीं है, सर!

पूरे सम्मान सहित छात्र ने अपना सिर झुकाकर कहा - महोदय! अब हम किस आधार पर आपकी बात पर विश्वास करें? (कक्षा में शान्ति छा गयी और अध्यापक महोदय की स्थिति ऐसी कि जैसे काटो तो खून नहीं)

अध्यापक - मुझे लगता है कि तुम्हें मुझ पर विश्वास ही करना होगा।

छात्र - सही बात! मनुष्य और भगवान में भी विश्वास का ही नाता है। और उस विश्वास के आधार पर इस जीवन की गति है।

(ऐसा कहा जाता है कि ये छात्र थे.............................. भारत के पूर्व राष्ट्रपति डा. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम, जिन्होंने अपने मीठे व्यवहार, अपनी कार्यकुशलता, देश के लिये समर्पण, Indian Space Program and Missile Program, जैसे महान कार्यों के लिये दिशा देकर देश के हर वर्ग व हर जाति के लोगों के दिल में अपनेलिये सुन्दर जगह बनाई। यही नहीं, अपनी सुन्दर कृतियों के लिये विश्व के 40 विश्वविद्यालयों ने आपको डाक्ट्रेट कि उपाधि से विभूषित किया।  
(The Times of India के The Speaking Tree Website की एक टिप्पणी से)

सोमवार, 5 फ़रवरी 2018

गौड़ीय मठ में रहन-सहन का आदर्श


द्वारा: श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर प्रभुपाद 
यदि तुम्हें ऋण उठाकर भी श्री कृष्ण कीर्तन का प्रचार करना पड़े तो कृपया प्रचार करो क्योंकि उस ऋण को चुकाने के लिए तुम्हें खुद को और अधिक रूप से सेवा में नियोजित करना पड़ेगा | जब उधार देने वाला व्यक्ति अपना ऋण तुमसे वापिस लेने के लिए तुम पर दबाव डालेगा तो तुम स्वयं अधिक भिक्षा मांगने के लिए बाध्य हो जाओगे | इसके अतिरिक्त धर्म परायण गृहस्थ व्यक्ति तुम्हें तब तक भिक्षा नहीं देगा जब तक उसे तुम्हारा आचरण और व्यवहार शुद्ध नहीं लगेगा और उस समय तुम्हें दृढ संकल्प करते हुए बहुत ध्यान से अपना आचरण विशुद्ध करना पड़ेगा | मैं तुम्हारे लिए एक पाई भी छोड़ कर नहीं जाऊंगा जिससे कि भविष्य में तुम आलस में लिप्त होकर हरिकथा और हरि सेवा से परिपूर्ण अपने पारमार्थिक जीवन का त्याग करो |

मठ हरि-कीर्तन का केंद्र है और हरि-कीर्तन ही हमारा जीवन व प्राण है | यह सुनिश्चित करने के लिए कि मठ में आलस्य, बुरे व्यवहार, तुच्छ विचार, निंदा, ग्राम्य वार्ता और काम-वासना के लिए कोई स्थान नहीं है, तुम्हें द्वार-द्वार पर जाना होगा जहाँ तुम्हारे हरि-कीर्तन की लोग परीक्षा लेंगे | जब लोग यह सोचेंगे कि वह तुम्हें भिक्षा देने वाले हैं और उनका पद तुमसे श्रेष्ठ है वह अनेक प्रकार से तुम्हारी निंदा करेंगे और सोचेंगे कि तुम उनकी दया के पात्र हो | शायद उनमे से कुछ तुम्हें मारने के लिए भी तैयार हों | उस समय तुम्हें एक ओर 'तृणादपि शुनीच' होकर अपने अंदर तृण से भी अधिक दीनता लानी होगी और 'मानद' होकर दूसरों को सम्मान देना होगा वहीं दूसरी ओर तुम्हें अपने जीवन और आचरण को विशुद्ध व आदर्श बनाने के लिए बहुत ध्यान देना होगा | जब तुम साधारण लोगों के दोषों को सुधारने के लिए साधु, शास्त्र व गुरु-वर्गों की वाणी का कीर्तन करोगे तो तुम स्वयं इन गलतियों को नहीं करोगे |

यदि कोई तुम्हारी निंदा करे तो दुखी मत होना क्योंकि तुम्हारे गुरु-वर्ग, शास्त्र और महाजन पूरी तरह से दोषरहित, नित्य मुक्त और भगवान के प्रिय पार्षद हैं |
यदि कोई अज्ञानतावश उनकी निंदा करे तो तुम उन्हें वास्तविक सत्य कथा बोल कर उनकी गलती को सुधारना | ऐसा करने से तुम दोनों को लाभ होगा | यदि तुम हरि-कीर्तन के लिए आवश्यक वस्तु एकत्रित करने के लिए आलसी होकर भिक्षा छोड़कर और लोगों द्वारा आलोचना किए जाने के भय से एकांत में रहकर भजन करने को प्राथमिकता दोगे तो तुम्हारा चरित्र कभी भी निर्मल न होगा और न ही तुम्हें आध्यात्मिक जीवन प्राप्त होगा | मैं कभी भी तुम्हें एकांत में रहकर भजन करने का अवसर नहीं दूंगा जहाँ तुम यह सोचो कि तुम्हें यहाँ कोई देख-सुन नहीं सकता और ऐसी भावना से तुम हृदय से अनुशासनहीन हो जाओ | तुम मेरे बहुत प्रिय मित्र हो इसलिए मैं तुम्हें कभी भी भगवान की सेवा को छोड़ने की अनुमति नहीं दूंगा | मैं नहीं चाहता कि इस संसार में अनित्य सुख प्राप्त करने हेतु व लोगों की निंदा से बचने के लिए तुम अपनी और उनकी इन्द्रियों को संतुष्ट करने में नियुक्त हो जाओ और अपना अमूल्य जीवन व्यर्थ गंवाओ |

बुधवार, 31 जनवरी 2018

जब शिष्य ऐसे अद्भुत हैं, तो ज़रा सोचो उनके गुरु कितने महान होंगे !

खेतुरी नामक गाँव में एक ब्राह्मण रहता था। एक दिन उसके दो पुत्र हरिराम अचार्य तथा रामकृष्ण आचार्य पिताजी के आदेश पर देवी को बलि देने के लिये बकरी लेकर जा रहे थे। उन्हें ऐसा करते देख, श्रील नरोत्तम ठाकुर जी ने उन्हें हिंसा के अशुभ परिणाम के बारे में समझाते हुए, भगवान के भजन की बात बताई। आपकी बात से वे दोनों इतने प्रभावित हुये के उन्होंने बकरी को छोड़ दिया । और आपसे दीक्षा लेकर श्रीकृष्ण भजन का संकल्प लिया ।

इस कार्य से उनके पिता बहुत नाराज़ हुए। वे मिथिला से मुरारी नाम के एक विद्वान पण्डित को ले कर आये ताकि वैष्णव सिद्धान्त को गलत साबित कर सकें। किन्तु हरिराम और रामकृष्ण नामक आपके दो शिष्यों ने ही गुरु-कृपा के बल पर उस पण्डित के सारी बातों को शास्त्र के आधार पर गलत प्रमाणित कर दिया। इससे दुःखी होकर उन दोनों के पिता शिवानन्द जी ने रात के समय देवी के आगे दुःख निवेदन किया। देवी ने उसे स्वप्न में डांटते हुए वैष्णवों के विरुद्ध आचरण करने से मना कर दिया।
इस प्रकार जब कई ब्राह्मण, जैसे श्रीगंगानारायण चक्रवर्ती, इत्यादि आपके शिष्य होने लगे तो कई ब्राह्मणों ने मिल कर राजा नरसिंह के पास शिकायत लगाई कि नरोत्तम नीची जाति का होते हुए भी उच्च जाति के ब्राह्मणों पर जादू कर उनको शिष्य बना रहा है । उसको ऐसा कार्य करने से रोकना चाहिए।

राजा के साथ परामर्श करने के बाद यह फैसला हुआ कि महादिग्विजयी पण्डित श्रीरूपनारायण के द्वारा नरोत्तम ठाकुर को हराना होगा। यह सोच कर सब खेतुरी धाम की ओर चल पड़े।

उधर श्रीरामचन्द्र कविराज और श्रीगंगानारायण चक्रवर्ती को जब ये सुनने को मिला कि राजा दिग्विजयी पण्डित एवं पण्डितों के साथ एक दिन कुमारपुर के बाज़ार में विश्राम करने के बाद फिर खेतुरी में आयेंगे तो, दोनों कुमारपुर के बाज़ार में कुम्हार और पान-सुपारी की दुकानें लगा कर बैठ गये।

उस शाम जब कुछ पण्डित उनकी दुकानों पर आये, तो श्रीरामचन्द्र तथा श्रीगंगानारायण उनके साथ संस्कृत में बात करने लगे। दुकानदारों का ऐसा पाण्डित्य देख कर वे आश्चर्यचकित रह गये। बातों ही बातों में दोनों ने पण्डितों के सारे तर्कों का खण्डन कर दिया। 

जब यह बात राजा ने सुनी तो वह भी वहाँ आकर शास्त्रार्थ करने लगे। श्रीरामचन्द्र कवीराज और श्रीगंगानारायण चक्रवर्ती ने बातों ही बातों में उनके सारे विचारों का खण्डन कर शुद्ध भक्ति सिद्धान्तों की स्थापना कर दी।

राजा और पण्डित सामान्य दुकानदारों का ऐसा अद्भुत पाण्डित्य देखकर 
हैरान रह गये।

राजा को जब यह मालूम हुआ कि ये दोनों नरोत्तम ठाकुर के शिष्य हैं तो राजा ने पण्डितों से कहा कि जिनके शिष्यों से ही आप हार गये, तो उनके गुरु के पास जाने से क्या होगा? जब शिष्य ऐसे अद्भुत हैं, तो ज़रा सोचो गुरु भला कैसे होंगे?

बाद में राजा नरसिंह और रूप नारायण ने देवी के द्वारा स्वप्न में आदेश पाने पर श्रील नरोत्तम ठाकुर से क्षमा मांगी और श्रीराधा-कृष्ण के भक्त हो गये ।

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज जी अपनी रचना ' श्रीगौरपार्षद और गौड़ीयवैष्णवाचार्यों का संक्षिप्त चरितामृत' में बताया है कि श्रील नरोत्तम 
ठाकुर जी श्रीकृष्ण लीला में चम्पक मंजरी हैं।